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प्यार :-आज -कल

पोस्टेड ओन: 24 Dec, 2011 जनरल डब्बा में

प्यार: एक शब्द जिसकी थोड़ी सी दस्तक जिंदगी को उन अनेक रगों से भर देती है जिसकी चमक आँखों को इन्दधनुष में भी देखने को नहीं मिलती. इस छोटे से शब्द में सागर से ज्यादा विशालता एव गहराई छिपी हुई है.आज के संदर्भ प्यार का ये अर्थ कल्पना मात रह गया है . जहा तक सैधांतिक दृष्टी की बात है तो इसके अर्थ में कोई परिवर्तन नही आया सिधांत कभी नहीं बदलते बल्कि वो सब्द आपनी वास्तविकता बदल लेता है. वेसे भी सिधांत हमेशा से ही वास्तविकता से कोसो दूर रहे है. इसी प्रकार परिवर्तनशील इस समाज में प्यार का हाल ये हुआ के वह अपनी मार्मिक छवि को छोड़ता हुवा वासनात्मक से जुड़ गया . तभी हिंदी की कवयत्री ममता कालिया लिखती है ” प्यार शब्द घिसते घिसते चोकोर हो गया है. अब हमारी समज में सिर्फ सहवास आता है”. हमारे समाज की संस्कृति में ही स्नेहवादी प्यार की प्रधानता रही है. उसने पश्चिमी सभ्यता की और कुछ ऐसी करवटे बदली की न तो वह पुर्ण रूप से उसके रंग से रंग पाया और न अपने अन्दर सिमटकर रह पाया. इस दोहरी स्थिति में हमारा समाज पश्चिम की तड़क भड़क का दीवाना भर रह गया. इसके परिणामस्वरुप न तो हमारे अन्दर इतना खुलापन आया की हम वासनात्मक प्यार को स्वीकार कर ले और न ही इतनी आत्मशक्ति की इस प्यार को अस्वीकार कर पाए .

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Amar Singh के द्वारा
December 24, 2011

आज कल लोग जिसे प्यार कहते है वो तो मात्र आकर्षण और वासना मात्र है और कुछ भी नहीं. क्योकि आज कल का प्रेम में दुःख आंसू और कष्ट देखने को मिलते है जो मात्र भोग और वासना का अंतिम रूप है. प्रेम तो शास्वत सुख का ही दूसरा नाम है. जिससे सदा सुख और आनद बरसता रहे. मैं मात्र उसे ही प्रेम मानता हु. जिससे दुःख, कष्ट मिले वह कदापि प्रेम नहीं हो सकता अपितु भोग, मोह और अगानता अवश्य होती है. आज के समय में प्रत्येक व्यक्ति किसी न किसी स्वार्थवश अन्य से प्रेम करने में लगा हुआ है. जब तक उसका स्वार्थ सिद्ध होता है प्रेम है, अन्यथा नहीं. सशर्त प्रेम अर्थात कस्त्पूर्ण प्रेम. निस्स्वार्थ प्रेम आन्द्दायक प्रेम. http://singh.jagranjunction.com

shaktisingh के द्वारा
December 24, 2011

हमारे समाज ने और किसी चीज को सिखा है या नहीं यह तो नहीं कह सकते लेकिन छिपाना बेहतर तरीके से सिखा है.




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